बंधनों में बंधा यह मानव मन बंधक बना गुहार लगा रहा ॥
एक डोर कस रही प्रति क्षण, निश्चित अपनी ही किसी कल्पना का बोझ उठा रहा ।
हर साँस जो आ रही हृदय में, भावनाओं का वो बवंडर ला रही ॥
शांत हो जाने का साहस नहीं, कदाचित् तभी प्रयास का परचम फहरा रही ।
उठकर कोशिश की इन पैरों ने भी उन बेड़ियों से मुक्ति पाने की,
कभी झटक कर कभी पटक कर तो कभी खींचा तानी की ।
मस्तक रहा अटल सदा ही पर समय की क्षमता से अज्ञान फिरा, प्रतिबिंब देख स्वयं का ही जब अचरज यूँ अपार घिरा ॥
जिसकी छवि आँखों तक पहुँची वह तो कोई लाचार दिखा,
दृढ़ता का वह भाव धरा था, उसपे मन की गुत्थी का अंबार पड़ा था ।
तभी अश्रु छलके नयन से बिन मंज़िल के बह जाने को, शब्दों ने भी साथ जो छोड़ा प्रकट व्यथा से पार पाने को ।
निर्बल-सबल का ज्ञान विफल अब, चित्त का यह संवाद सरल सा ॥
समस्याओं का यह अंधकार घना है, उस पर आशंकाओं का भार बड़ा ।
ओझल हो रही जिसकी परिभाषा नाम शायद उसका सामर्थ्य है, कहीं डरा सा और सहमा सा छुप कर देख रहा वो सब है ।
आँखों से जो छलक रहा वो धार प्रवाह सा बन चला, भटक रहा चाहु दिशा में, ना जाने किस संजोग का बाँध टूटा ॥
स्थिरता की खोज में मानव उतना ही अस्थिर हो चुका, जग त्यागने के भय से मोह जाल में फँस चुका ।
सुख और दुःख का भेद ना जाना, किन मापदंडों में उलझता गया ॥
तोल रहा वो पर-जीवन को निज तराज़ू का बोझ बढ़ा ।
ऐ मानव मन ! तेरी गुहार साहस ने स्वीकारी है पर इस बार सहज ना होगा यह संदेश भी जारी है ।
भेद सका जो इस आशय को अंधेरे को चीर प्रकाश बना, हताशाओं पर आशा की जय से नयी दिशा का ज्ञान जगा ।
तज के भय का आँगन निपुणता की चौखट लाँग चला, अपने स्वप्न नगरी में जिसने वास्तविकता का है मान रखा ।
है स्वीकार आज त्रुटि भी मुझको, आलिंगन स्वयं को लगाया है, साहस का अर्थ संभवतः आज समझ में आया है ।
धीर धर ऐ मानव मन ये बस समय की माया है ॥
जो है नश्वर उसे क्यों बाँध रहा, तू सोच ज़रा क्या पाया है ।
जिसको खोने मात्र के भय से तूने संपूर्ण विश्व को हुंकार लगाया है, क्या वो सिर्फ़ स्पर्श मात्र है या अनुभवों की छाया है ।
धीर धर ऐ मानव मन ये बस समय की माया है ॥
-श्वेता सुरभि ⏳