इस अधूरेपन में एक अलग सी सहजता झलक जाती है, सुख की ख़ुशी और दुख की निराशा थोड़ा कम प्रभाव दर्शाती है ।
समय की करवट से यह ह्रदय थोड़ा और ठोस हो जाता है, इस जीवन जीने के छल को ये नया साहस दे जाता है ।
अधूरे सपने, अधूरी बातें, अधूरा ही तो है ये संसार, अधूरा था कल, अधूरा होगा कल, अधूरा ही रहेगा ये आज ।
पूरा करने की होड़ हर क्षण एक अस्थिरता सी लाती है, व्याकुलता का तांडव रच स्वयं धराशायी हो जाती है ।
हर प्रयास को विफल कर ये मन ही मन इठलाती है, फिर अपने ही भाव प्रपंच से पूर्ण हताश हो जाती है ।
पल में रस भर, पल में निरस हो, ये जो खेल रचाती है, जो समझा वो भी जान ना पाया, ऐसा उत्पात मचाती है ।
स्थिर हो कर जब मैंने इस व्याकुलता के पार निहारा, चंचल मन के सूने कोने में किसी का हाथ अपने सर पर पाया ।
चौंक गयी मैं जब पलट कर अधूरापन मुझे देख मुस्कुराया , शांत भाव से फिर उसने मुझे स्नेहपूर्ण आलिंगन लगाया ।
पूछा जब मैंने उसके उपस्थिति का कारण तो उसने अपना हाथ बढ़ाया, ले चला अपनी धून में अपने संग, संयम भरा मार्ग दिखाया।
शांत मन की खोज में आज तक भटक रही थी जो मेरी छाया, वहाँ ख़ुद को ख़ुद के साथ पाकर बिछड़ा हुआ अपना हमदम पाया ।
बिन बोले अधूरेपन ने मुझको जीवन का वो सार सिखाया, जिसने स्वीकारा अपनी परिस्थिति को, उसने ही सुख-शांति का परचम लहराया ।
ना कोई क्लेश है हृदय में, ना ही कोई मन में है अब ग्लानि, बस मुस्कुराहट लिए चले हैं मुख पर और उसके साथ अपनी कहानी ।
जब जीवन के ये क्षण शेष हैं तो अधूरा ही रहेगा हमारा क़िस्सा, क्यूँ विचलित हो रहा ऐ राही ! आख़िर ये भी तो है तेरे ही वृतांत का हिस्सा ।
मायूसी को खदेड़ दूर भगा, संशयवादी भाव हटा, थोड़ा सा साहस जुटा फिर आशा की लौ जला और ये क़िस्सा तू रचता जा ।
बीते कल और आज के बाद, आने वाला कल खड़ा है, हर क्षण के बीतते ही, दूसरा क्षण झट चढ़ा है ।
पूर्ण हुआ तो थम जाएगा जीवन का ये प्रवाह,बहता चल ऐ राही मन ! तू कर हर उठती लहर को स्वीकार ।
राही के मंज़िल पाने तक अधूरी ही रहेगी उसकी यात्रा, खुल कर मिलता चल हर पथिक से, करता सबके भावों का पूर्ण सम्मान ।
कभी थम कर सुस्ता ऐ साथी फिर कर तनिक इस ओर विचार…
… अपनी कहानी का रचयिता भी तू है, अपनी कहानी का तू ही है कलाकार ।
-श्वेता सुरभि ⏳